संगीत क्या है, संगीत की रचना किसने की ?, What is music.How music was composed.who composed it-AK91

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संगीत क्या है 

यह तो हम सब जानते ही है पर क्या आप जानते है "संगीत की रचना किसने की", "संगीत कैसे बना", "संगीत यंत्र कैसे बना", " 'तंत्र वाद्य यंत्र' कैसे बना 'वीणा' " तो आइए फ्रेंड्स आज हम आपको बताने वाले है यह सभी बातें हमारे इस पोस्ट में ।

 पोस्ट को पूरा पढ़े तो जानकारी पूरी मिलेगी ।

शिव जी की संगीत रचना
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कहां जाता है, हजारों साल पहले शिव जी ने संगीत के सात स्वरों व पांच रागो की रचना की है। वेद और पुराणों में यह कहानी पढ़ने को मिलती है। संगीत की रचना सामवेद में वर्णित है। हजारों साल पहले जब हमारे देवी देवता जीवित हुआ करते थे तब उनके द्वारा बहुत सी ऐसी रचनाएं हुई जो आज तक पूजी और मानी जाती है। हमारे पौराणिक कथाओं वेदों पुराणों से उपनिषदों से हमें जो जानकारी मिलती है। उसके हिसाब से हम आज का जीवन देखें तो बिल्कुल विपरीत हो चुका है। लेकिन यह कलयुग भी आज हमें नसीब हुआ है। इसके लिए हम बहुत ही आभारी हैं। हम जीवित मनुष्य का जो फर्ज है। जो कार्य है। उसे हमे करते हुए अपने जीवन लक्ष्य की ओर जाना हैं। जीवन में संसार में सिर्फ और सिर्फ जीवात्मा ही सर्वस्व है। नहीं तो कुछ भी नहीं है। इसलिए अपना जीवन खुलकर जिए और भूल से भी किसी दूसरे के कर्म का प्रभाव अपने कर्मों पर न पड़ने दें अपने कर्मों को हमेशा अच्छे कर्म की तरफ बढ़ाएं......

शिव से संगीत
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ब्रह्माजी द्वारा सामवेद में संगीत की पूरी जानकारी लिखित रूप में रखी गई थी। एक बार शिव जी अपने कैलाश पर्वत में विराजित थे उन्होंने सोचा कुछ तो है जो मैं इस बार खोज रहा हूं लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा है। अचानक उन्होंने पार्वती जी को सैया पर सोते हुए देखा पार्वत में सैया पर जब पार्वती जी एक हाथ सर पर टेके हुई और लंबे पैर किए हुए लेटि थी तब बहुत ही सुंदर और प्यारी आकृति उनको दिखाई दी शिव जी ने माता पार्वती को देखा,देखते ही उनके मन में एक विचार आया कि मुझे कुछ निर्माण करने की आवश्यकता तो लग रही है। लेकिन अब समझ आ गया है कि मुझे किस चीज का निर्माण करना है। उन्होंने उस आकृति को देख तंत्र वाद्य यंत्र की रचना की  तंत्र वाद्य यंत्र  को एक ऐसी आकृति दी जो कि पार्वती जी के शयन आकृति की तरह थी और  फिर तंत्र वाद्य यंत्र  में 5 तार बांधे गए और उन तारों को उसके सिर से लेकर अंतिम सिरे तक बांध दिया गया। अब शिवजी बहुत प्रसन्न है कि उनके द्वारा यह बनाई हुई वस्तु जिसका नाम उन्होंने  वीणा दिया अब बनकर तैयार हो गई है। लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कैसे इन को स्वर को मैं स्थगित करूं तब शिवजी ने पहले तार का  स्वर छेड़ा चारों तरफ कंपन बहुत ही कर्कश लगी लेकिन जैसे ही वह ध्वनि आकर किसी स्थान पर स्थगित हो गई तब उससे एक स्वर बन गया उसका नाम रख दिया गया और उसे स्थगित कर दिया गया इसी प्रकार वीणा में हर  तारों को इसी प्रकार बजाया गया और जहां स्थगित हुआ वह आकर रुका उसे स्थगित स्वर नाम के साथ दे दिया गया। इस प्रकार संगीत में सात स्वर माने गए, एवं श्रुतिया 22 मानी गई जो कि सुनने लायक होती हैं और इनके बीच में बहुत सी ऐसी ध्वनिया होती है जो बेसुरी और बेकार होती।

अब शिव जी ने यह घोषणा तो कर ली संगीत की उत्पत्ति हो चुकी हैं। लेकिन उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था इस पवित्र रचना को मैं किसके हाथों में सोंपू कि यह हमेशा सुरक्षित रखी रहे उनके मन में चारों दिशाओं में चारों लोको में बस एक ही विद्या की देवी सरस्वती जी का ही ध्यान आया और उन्होंने सरस्वती जी को तुरंत बुलवाया और कहां की हे देवी मेरे द्वारा यह वाद्य यंत्र की उत्पत्ति की गई है। आप इस वाद्य यंत्र को संभाल कर रखे, सरस्वती जो को चारों लोको में ज्ञान की देवी ज्ञान की रक्षिका कहा जाता है। उन्हें संगीत का यह ज्ञान विवेक और संपूर्णता के साथ दे दिया गया शिव जी अब बहुत प्रसन्न थे क्योंकि सरस्वती जी के हाथ में उन्होंने यह वाद्य यंत्र देकर अपने इस कार्य को संपूर्ण किया था। इस तरह सरस्वती जी भी बहुत प्रसन्न थी और उन्होंने जैसे ही वीणा पर अपने हाथ को फिरना शुरु किया उसी तरह संगीतमय होकर पूरा संसार झूमने लगा नाचने लगा गाने लगा और एक अजीब सी कंपन और धारा में अजीब सा आनंद प्राप्त होने लगा कहा जाता है कि संगीत जीवन का मधुर आनंद है जिसे व्यक्ति सुनकर आनंदित और सिर्फ आनंदित हुआ जाता है। सरस्वती जी के द्वारा यह विद्या तीन वर्गों में विभाजित की गई तीन वर्ग में पहला तो किन्नर (छक्का) दूसरा गंधर्व (देवी-देवता)और तीसरा अप्सराओं (नृत्यांगनाओं) को यह वरदान दिया गया कि वह जन्मजात संगीत में प्रतिष्ठित रहेंगे इसलिए आप देखते हैं किन्नरों को संगीत नहीं सिखाया जाता है वह इस कला में पैदाइशी माहिर होते हैं गंधर्व भी और अप्सरा में भी इस विद्या और संगीत रूपी धन से सुसज्जित रहते हैं।
इसीलिए कहते हैं दोस्तों सरस्वती जी विद्या की देवी तो है ही साथ में संगीत की भी देवी है। इसलिए आप तहे दिल से जब भी संगीत विद्यालय या संगीत की तरफ आकृष्ट हो तो सबसे पहले अपनी सरस्वती देवी मैया का आवाहन करिए उनकी पूजा करिए उनको अपने ध्यान से मिला लीजिए और बस अपने जीवन को सफलता की ओर ले चलिए आप पाएंगे कि आपके जीवन में एक आनंद है एक संगम है एक संगीत है एक शांति है और एक संतुष्टि है क्योंकि जो व्यक्ति संतुष्ट आत्मा हो जाता है उसे संसार की मोह माया कभी घेर नहीं सकती है कभी सता नहीं सकती है कभी रुला नहीं सकती है हे मेरे मित्रों आपको संगीत की तरफ अपनी रुचि रखनी चाहिए और इस मधुर संगीत को अपने जीवन में
बो लेना चाहिए ताकि आपका हृदय हमेशा हमेशा के लिए शांत और स्थाई भाव से घिर जाए इस तरह आज की कहानी मैं यहीं समाप्त करती हूं !

साथ ही हमें सीखने को मिलता है कि किस तरह हमारे देवी देवता  भी आपस में एक दूसरे की मदद करते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। उन्होंने अगर कोई चीज बनाया है तो वह दूसरों की भलाई के लिए जो भी निर्माण किया है दूसरों के उपकार के लिए तो मेरा आपसे एक ही निवेदन है कि आप भी अपने जीवन में कुछ ऐसा करिए जो दूसरों के उपकार के लिए हो ना कि स्वार्थ सिद्धि के लिए क्योंकि आपका यह मनुष्य तन मनुष्य जीवन आपको इसी रूप में जीना है। लेकिन आप जब कुछ बन जाते हैं। आप की प्राण प्रतिष्ठा आपका मान-सम्मान लोग स्वयं सुरक्षित रखने लगते हैं। आपको वह अपना आदर्श मानने लगते हैं। तब आपका जीवन सफल हो जाता है। तब आपकी सारी संघर्ष भरी जीवन कथाएं भी प्यारी लगने लगती है। और बस इसी आदर्श और सम्मान के साथ मैं कहना चाहूंगी कि हमें ईश्वर रूपी अस्तित्व से जुड़कर अपने जीवन रूपी अस्तित्व को साक्षात पूर्ण करना चाहिए। और हमें सफलता पानी चाहिए अपने मन को खोजना चाहिए कि वह क्या चाहता है। और लक्ष्य बनाकर उस पर हमें प्राप्ति की ओर बढ़ना चाहिए।

                 धन्यवाद!
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@Satrangi91,@Aaru, #Satrangi91

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